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प्राचीन काल में होली को कहा जाता था ईद-ए-गुलाबी आइये जानते है क्यों

भारत के मुख्य त्योहारों में से एक है होली, जिस आम तौर पर लोग रंगो का त्योहार भी कहते है भारत में मुख्या त्योहारों से एक मुख्या त्योहार है जिसमे अच्छाई  की जित को माना जाता है आइये  अब ये जानते है कि प्राचीन काल में होली को कहा जाता था ईद-ए-गुलाबी आइये जानते है जी हा  सुनकर आप भी होंगे हैरान जी हां ये नाम ही कुछ ऐसा है जिसे सुनकर आप को ये ज़रूर जानना चाहेंगे की आखिर क्यों होली का नाम ईद-ए-गुलाबी  रखा गया था.










होली से घरो में खुशिया आती है ऐसा मानना  है सभी है घरो में ढोल की धूम होती है कही नए नए पकवान बनते है हर तरफ ख़ुशी का मौहोल होता है संगीत के साथ साथ एक दूसरे पर रंग फेकना इन सभी तरह की मस्ती होती है होली में.इस के सतह ही प्राचीन काम में होली को पौराणिक कथाएं  से जुडी हुयी है इसका ज़िक्र भारत की विरासत यानि की ग्रंथो में हुआ है शुरू में होली को पर्व को होलाका के नाम से भी जाना जाता था. इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ किया करते थे. मुगल शासक शाहजहां के काल में होली  को ईद-ए-गुलाबी के नाम से संबोधित किया जाता था.








होली  को लेकर जिस पौराणिक कथा की सबसे ज्यादा मान्यता है वह है भगवान शिव और पार्वती की. पौराणिक कथा में हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो लेकिन शिव अपनी तपस्या में लीन थे. कामदेव पार्वती की सहायता के लिए आते और प्रेम बाण चलाकर भगवान शिव की तपस्या भंग करते थे.शिवजी को उस दौरान बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी. उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया. इन सबके बाद शिवजी पार्वती को देखते हैं पार्वती की आराधना सफल हो जाती है और शिवजी उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं. होली  की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम के विजय के उत्सव में मनाया जाता है.